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“मैं धार्मिकता सिखाता हूँ, धर्म नहीं” ओशो की एक साहसिक और क्रांतिकारी कृति है, जिसमें वे संगठित धर्म, परंपराओं और रूढ़ मान्यताओं से परे जाकर “धार्मिकता” की बात करते हैं। ओशो के अनुसार धर्म कोई संस्था, संप्रदाय या मत नहीं है—धार्मिकता एक जीवंत अनुभव है, जो भीतर की जागरूकता से जन्म लेता है।

इस पुस्तक में ओशो बताते हैं कि सच्चा धार्मिक व्यक्ति वह है जो सचेत है, प्रेमपूर्ण है, स्वतंत्र है और अपने अनुभव से सत्य को जानता है। वे अंधविश्वास, भय-आधारित आस्था और बाहरी कर्मकांडों पर तीखा प्रश्न उठाते हैं तथा ध्यान, जागृति और आत्मानुभूति को धार्मिकता का आधार मानते हैं।

ओशो की शैली सीधी, तार्किक और झकझोर देने वाली है। वे पाठक को चुनौती देते हैं कि वह उधार की मान्यताओं को त्याग कर स्वयं खोज करे। यह पुस्तक आध्यात्मिक खोजियों, युवाओं और स्वतंत्र चिंतन करने वाले पाठकों के लिए विशेष रूप से प्रेरक है।

आज के समय में, जब धर्म अक्सर विभाजन का कारण बनता है, यह कृति बताती है कि धार्मिकता व्यक्ति को भीतर से प्रेम, करुणा और चेतना से भर देती है।

Publisher: A REBEL BOOK

Language : HINDI

Binding: PAPER BACK

Pages : 130