“अंधों की बस्ती है और रोशनी बेचता हूँ” ओशो का एक गहन और झकझोर देने वाला प्रवचन-संग्रह है, जिसमें वे कहते हैं — “मैं कहता आँखों देखी”। इसका अर्थ है कि वे उधार की बात नहीं करते, न किसी परंपरा का अंधानुकरण करते हैं, बल्कि अपने प्रत्यक्ष अनुभव से सत्य की बात करते हैं।
इस पुस्तक में ओशो मानव समाज की मानसिक अंधता, परंपराओं के बंधन, धर्म की रूढ़ियाँ और व्यक्ति की सोई हुई चेतना पर तीखा प्रहार करते हैं। वे समझाते हैं कि असली अंधापन आंखों का नहीं, चेतना का होता है। जब व्यक्ति जागरूक होता है, ध्यान करता है और अपने भीतर झांकता है — तभी उसे सच्ची ‘रोशनी’ मिलती है।
यह किताब आत्म-जागरण, ध्यान, स्वानुभव, आंतरिक क्रांति और स्वतंत्र चिंतन पर आधारित है। ओशो का अंदाज़ बेबाक, तार्किक और विद्रोही है, जो पाठक को सोचने पर मजबूर करता है। वे बताते हैं कि सत्य किसी ग्रंथ में बंद नहीं है; उसे स्वयं अनुभव करना पड़ता है।
आज के समय में, जब भ्रम, दिखावा और आधी-अधूरी जानकारी हर ओर फैली है, यह पुस्तक एक ऐसी मशाल है जो व्यक्ति को भीतर की रोशनी से जोड़ती है। जो पाठक आध्यात्मिकता को अनुभव करना चाहते हैं — केवल मानना नहीं — उनके लिए यह पुस्तक अत्यंत प्रभावशाली है।
Publisher: A REBEL BOOK
Language : HINDI
Binding: Hard Cover
Pages : 518

